जानिये क्रिकेट इतिहास की किस घटना के कारण फील्डिंग के नियम बने?

क्या आप जानते हैं कि जब क्रिकेट का खेल अपने शुरूआती दौर में था तो केवल बोलिंग और बैटिंग के लिए नियम बनाये गये थे और फील्डिंग के लिए कोई नियम नहीं था, लेकिन क्रिकेट इतिहास की एक घटना ने क्रिकेट प्रशासकों को फील्डिंग के लिए भी नियम बनाने पर मजबूर कर दिया था?

क्रिकेट पूरी तरह से अनिश्चितताओं से भरा खेला माना जाता है इसमें सिर्फ एक गेंद वो कमाल कर देती है जो कि पूरे मैच के दौरान फेंकी गयीं 299 गेंदें नहीं कर पातीं हैं. इसलिए क्रिकेट के खेल में फैसला केवल अच्छी गेंदबाजी या अच्छी बल्लेबाजी के दम पर नहीं होता है बल्कि कई बार इस फैसले में फील्डिंग की बहुत ही अहम् भूमिका होती है.

(कभी कभी इस तरह की फील्डिंग भी लगा दी जाती है)

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28 नवम्बर 1979  के दिन इंग्लैंड और वेस्ट इंडीज के बीच “बेंसन एंड हेजेज” क्रिकेट सीरीज 1979-80 का दूसरा मैच चल रहा था. यह मैच सिडनी के मैदान पर खेला जा रहा था. इंग्लैंड ने पहले बैटिंग करते हुए 211रन बनाये थे. इस मैच के बीच में बारिश हुई तो टारगेट को बदल दिया गया और वेस्टइंडीज को 47 ओवर में 199 रनों का लक्ष्य दिया गया. वेस्टइंडीज को आखिरी ओवर में 10 रन चाहिए थे.

इंग्लैंड की ओर से गेंदबाजी इयान बॉथम कर रहे थे और पहली 5 गेंदों पर 7 रन बन गये थे और अब वेस्टइंडीज को आखिरी एक गेंद पर जीत के लिए 3 रनों की जरूरत थी. ध्यान रहे कि इयान बॉथम की गिनती उन गेंदबाजों में होती है जिन्होंने कभी भी “नो बॉल” नही फेकी है.

इंग्लैंड सिरीज का पहला मैच हार चुका था इसलिए उसे इस मैच में हर हाल में जीत दर्ज करनी थी, इसलिए इंग्लैंड के कप्तान ने एक ऐसी फील्डिंग लगायी कि आने वाले इतिहास में क्रिकेट पूरी तरह से बदल गया.

इंग्लैंड के कप्तान माइक ब्रियरले ने चौका या छक्का रोकने के लिए टीम के “विकेट कीपर सहित” सभी 10 खिलाडियों को बाउंड्री पर लगा दिया. इस हालात में या तो दौड़कर 3 रन लिए सकते थे या फिर छक्का लगाकर मैच जीता जा सकता था. अंततः मैच का परिणाम इंग्लैंड में पक्ष में गया और वेस्टइंडीज केवल 2 रन से यह मैच हार गया.

हालाँकि इंग्लैंड के कप्तान द्वारा लगाई गयी इस तरह की फील्डिंग उस समय के नियमों का उल्लंघन नहीं थी क्योंकि उस समय यह तय नहीं था कि कितने खिलाड़ी बाउंड्री पर लगाये जा सकते हैं और कितने 30 गज के घेरे के अन्दर रहेंगे.

इस मैच की इस घटना ने सभी क्रिकेट प्रशासकों को चौकन्ना कर दिया और फील्डिंग के लिए नए नियम बनाने पर बाध्य कर दिया.

फील्डिंग के नियम मुख्य रूप से 1980 के दशक में बनने शुरू हुए थे और पहली बार फील्डरों की नियुक्ति से सम्बंधित नियमों को 1980 में ऑस्ट्रेलिया में खेले गये एक दिवसीय मैचों में लागू किया गया था.

वर्ष  1992 के वर्ल्ड कप में यह नियम बन गया कि पहले 15 ओवर में 30 गज के घेरे के बाहर सिर्फ 2 खिलाड़ी ही बाहर रहेंगे और 16वें ओवर के बाद घेरे के बाहर 5 खिलाड़ी रखने की इजाजत होती थी; साथ ही पावरप्ले के दौरान दो खिलाड़ियों को कैचिंग पॉजीशन पर रहना भी जरूरी होता था.

ICC ने पॉवर प्ले से सम्बंधित नियम सबसे पहले 2005 में शुरू किये थे. ICC ने मैच में कुल 3 पॉवर प्ले को लागू किया था और पावर प्ले को 20 ओवरों का बना दिया गया था. ये तीन पावरप्ले थे;

1. अनिवार्य पावरप्ले (10 ओवर): इस दौरान फील्डिंग करने वाली टीम 30 गज के घेरे के बाहर अधिकतम 2 फील्डर रख सकती थी.

2. बैटिंग पावरप्ले (5 ओवर): इस पावरप्ले में तीन क्षेत्ररक्षकों को 30 गज के घेरे के बाहर रखा जा सकता है. साथ ही इस पावरप्ले को 40 ओवरों तक इस्तेमाल करना जरूरी होता था.

3. बॉलिंग पावरप्ले (5 ओवर): इस पावरप्ले में भी बॉलिंग पावरप्ले के नियम लागू होते थे. इस दौरान 30 गज के सर्कल के बाहर 3 से ज्यादा फील्डर नहीं हो सकते थे.

वर्तमान में अब नए नियम लागू कर दिए गए हैं. अब ऊपर लिखे गए तीनों पॉवर के स्थान पर पॉवर प्ले-1, पॉवर प्ले-2 और पॉवर प्ले-3 लागू किये जाते हैं.

अब 50 ओवरों के एकदिवसीय मैच में तीन पॉवर प्ले इस प्रकार हैं;

पॉवर प्ले-1: यह पॉवर प्ले 1 से 10 ओवरों के बीच लागू होता है जिसमें 30 गज के घेरे के बाहर केवल 2 खिलाड़ी रह सकते हैं.

पॉवर प्ले-2: यह पॉवर प्ले 11 से 40 ओवरों के बीच लागू होता है जिसमें 30 गज के घेरे के बाहर केवल 4 खिलाड़ी रह सकते हैं.

पॉवर प्ले-3: यह पॉवर प्ले 41 से 50 ओवरों के बीच लागू होता है जिसमें 30 गज के घेरे के बाहर केवल 5 खिलाड़ी रह सकते हैं.

अब T-20 मैच के लिए पॉवर प्ले में यह नियम लागू होता है;

T-20 मैच में केवल एक ही पॉवर प्ले होता है जो कि पहले 6 ओवर में लागू होता है. इन 6 ओवरों में 30 गज के बाहर केवल 2 खिलाड़ी ही रह सकते हैं. बाकी के 14 ओवरों के दौरान 5 खिलाड़ी 30 गज के घेरे के बाहर रह सकते हैं. यही कारण है कि T-20 मैच में पहले 6 ओवर में अक्सर सभी गेंदबाजों की जमकर धुलाई होती है और अक्सर यह पॉवर प्ले ही तय कर देता है कि मैच में किस टीम का पलड़ा भारी है.

इस प्रकार स्पष्ट है कि यदि 1979में इंग्लैंड और वेस्ट इंडीज मैच के दौरान यदि वह घटना ना घटी होती तो ऐसा मुमकिन था कि आगे और कई सालों तक क्रिकेट के लिए फील्डिंग के नियमों में कोई बदलाव ना किया जाता.

दरअसल क्रिकेट के हर क्षेत्र जैसे बैटिंग, फील्डिंग और बोलिंग में नए नियम इसलिए बनाये गये हैं ताकि इन सभी क्षेत्रों में खूब प्रतियोगिता हो और हर मैच लोगों को बखूबी रोमांच पहुंचाए.

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