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पोंगल महोत्सव क्यों मनाया जाता है?

भारत एक विविधतापूर्ण देश है’। इसके विभिन्न भागों में भौगोलिक अवस्थाओं, निवासियों और उनकी संस्कृतियों में काफी अन्तर है। कुछ प्रदेश अफ्रीकी रेगिस्तानों जैसे तप्त और शुष्क हैं, तो कुछ ध्रुव प्रदेश की भांति ठण्डे है। यही प्रकृति विविधता यहाँ की प्रचुरता और प्राकृतिक संसाधनों के महत्व को याद दिलाती है, खासकर जब पूरी दुनिया पर्यावरण परिवर्तन से जूझ रही हो। भारत की त्योहारों पर नजर डालें तो ज्यादातर त्योहारों फसल कटाई के बाद ही पड़ते हैं।

पोंगल क्या है?

पोंगल का तमिल में अर्थ उफान या विप्लव होता है। यह तमिल हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है और ये सम्पन्नता को समर्पित त्यौहार है जिसमें समृद्धि लाने के लिए वर्षा, धूप तथा खेतिहर मवेशियों की आराधना की जाती है। इस त्यौहार का नाम पोंगल इसलिए है क्योंकि इस दिन सूर्य देव को जो प्रसाद अर्पित किया जाता है वह पगल कहलता है।

यह चार दिनों तक चलने वाला पर्व पूर्णतया प्रकृति को समर्पित है और हर दिन के पोंगल का अलग अलग नाम होता है- भोगी पोंगल ,सूर्य पोंगल ,मट्टू पोंगल और कन्या पोंगल। नए धान का चावल निकाल कर उसका भोग बनाकर ,बैलों को एवं घरों को साफ़ सुथरा करके उन्हें सजाकर,भैया दूज की तरह भाइयों के लिए बहनों द्वारा लंबी आयु के लिए प्रार्थना करने की प्रथा ठीक उस प्रकार है जैसी  उत्तर भारत में मनाये जाने वाले पर्वों में होती है जैसे -छठ, भैया दूज एवं गोवर्धन की पूजा।

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पोंगल का इतिहास

इस त्योहार की शुरुवात संगम युग से हुआ है लेकिन कुछ इतिहासकारों का मानना है की यह त्योहार कम से कम 2,000 साल पुराना है। इसे ‘थाई निर्दल के रूप में मनाया मनाया जाता था।

तमिल मान्यताओं के अनुसार मट्टू भगवान शंकर का बैल है जिसे एक भूल के कारण भगवान शंकर ने पृथ्वी पर रहकर मानव के लिए अन्न पैदा करने के लिए कहा और तब से पृथ्वी पर रहकर कृषि कार्य में मानव की सहायता कर रहा है। इस दिन किसान अपने बैलों को स्नान कराते हैं उनके सिंगों में तेल लगाते हैं एवं अन्य प्रकार से बैलों को सजाते है। बालों को सजाने के बाद उनकी पूजा की जाती है। बैल के साथ ही इस दिन गाय और बछड़ों की भी पूजा की जाती है। कही कहीं लोग इसे केनू पोंगल के नाम से भी जानते हैं जिसमें बहनें अपने भाईयों की खुशहाली के लिए पूजा करती है और भाई अपनी बहनों को उपहार देते हैं।

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पोंगल महोत्सव क्यों मनाया जाता है?

यह त्योहार पारम्परिक रूप से ये सम्पन्नता को समर्पित त्यौहार है जिसमें समृद्धि लाने के लिए वर्षा, धूप तथा खेतिहर मवेशियों की आराधना की जाती है। सूर्य को अन्न धन का दाता मान कर चार दिनों तक उत्सव मानाया जाता है और उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित किया जाता है। विषय की गहराई में जाकर देखें तो यह त्यौहार कृषि एवं फसल से सम्बन्धित देवताओं को समर्पित है।

पोंगल का महत्व

यह त्योहार का मूल भी कृषि ही है। जनवरी तक तमिलनाडु की मुख्य फ़सल गन्ना और धान पककर तैयार हो जाती है। कृषक अपने लहलहाते खेतों को देखकर प्रसन्न और झूम उठता है। उसका मन प्रभु के प्रति आभार से भर उठता है। इसी दिन बैल की भी पूजा की जाती है, क्योंकि उसी ने ही हल चलाकर खेतों को ठीक किया था। अतः गौ और बैलों को भी नहला–धुलाकर उनके सींगों के बीच में फूलों की मालाएँ पहनाई जाती हैं। उनके मस्तक पर रंगों से चित्रकारी भी जाती है और उन्हें गन्ना व चावल खिलाकर उनके प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है। कहीं–कहीं पर मेला भी लगता है। जिसमें बैलों की दौड़ व विभिन्न खेल–तमाशों का आयोजन होता है।

जैसा कि हम जानते हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और अधिकांश त्योहारों का झुकाव प्रकृति की ओर होता है। एक अन्य त्योहार की तरह, पोंगल को उत्तरायण पुण्यकलम के रूप में जाना जाता है जो हिंदू पौराणिक कथाओं में विशेष महत्व रखता है और इसे बेहद शुभ माना जाता है।

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