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    सन 1900 के दशक से भारत में महामारियों का इतिहास

    वर्तमान में भारत; COVID-19 या कोरोनावायरस महामारी की चपेट में है लेकिन ऐसा नहीं है कि ऐसा भारत में पहली बार हुआ है. दरअसल भारत में महामारियों का इतिहास 1900 के दशक से ही रहा है. आइये इस लेख में इन सभी के इतिहास पर एक नजर डालते हैं.
    Created On: Sep 11, 2020 19:30 IST
    Modified On: Sep 11, 2020 19:31 IST
    History of Epidemics in India
    History of Epidemics in India

    भारत ने 1990 के दशक से कई महामारियों के प्रकोप देखे हैं जैसे कि सार्स का प्रकोप, स्वाइन फ्लू का प्रकोप और कोरोना का प्रकोप. लेकिन इनमें कोई भी प्रकोप COVID-19 जैसा व्यापक और घातक नहीं था. यहां, इस लेख में, हम आपको उन प्रमुख प्रकोपों के बारे में बताएंगे जो भारत ने 1990 के दशक से देखे हैं.

    सबसे पहले देखते हैं कि महामारी क्या होती है? (What is an Epidemic)

    जब किसी रोग का प्रकोप सामान्य की अपेक्षा पहले की अपेक्षा बहुत अधिक होता तो उसे महामारी (epidemic) कहते हैं. महामारी किसी एक स्थान, क्षेत्र या जनसंख्या के भूभाग पर सीमित होती है. यदि कोई बीमारी दूसरे देशों और दूसरे महाद्वीपों में भी फ़ैल जाए तो उसे पैनडेमिक (pandemic) कहते हैं. WHO ने अब कोरोना वायरस को पैनडेमिक यानी महामारी घोषित कर दिया है.

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    आसान शब्दों में पैनडेमिक उस बीमारी को कहा जाता है जो एक ही समय दुनिया के अलग-अलग देशों में लोगों में फैल रही हो. 

    आइये अब भारत में विभिन्न महामारियों के इतिहास को जानते हैं; (History of Epidemics in India)

    1915 - 1926: इंसेफेलाइटिस लेटार्गिका (1915 - 1926: Encephalitis Lethargica)

    इसे सुस्त इंसेफेलाइटिस के रूप में भी जाना जाता है. यह एक पैनडेमिक थी और 1915 -1926 के बीच दुनिया भर में फैल गई थी. एन्सेफलाइटिस; एक तीव्र संक्रामक बीमारी थी जिसका वायरस मानव के केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर हमला करता था.

    इस बीमारी की मुख्य विशेषताएं थी; बढ़ती हुई उदासीनता, उनींदापन और सुस्ती. यह नाक और मौखिक स्राव (nasal and oral secretions) से फैलता था. इंसेफेलाइटिस लेथार्गिका यूरोप में अपने महामारी रूप में था लेकिन भारत में इसका प्रभाव इतना अधिक नहीं था.

    1918 - 1920: स्पेनिश फ्लू (Spanish Flu)

    जबकि दुनिया अभी भी एन्सेफलाइटिस लेथर्जिका से लड़ रही थी, एक नया वायरस फैल गया जिसका नाम था ‘स्पेनिश फ्लू’. यह एवियन इन्फ्लूएंजा के घातक स्ट्रेन  के कारण शुरू हुआ और प्रथम विश्व युद्ध के कारण फैल गया था. भारत में, इस बीमारी को वे सैनिक लाये जो प्रथम विश्व युद्ध में लड़ाई लड़ने गये थे.

    1961 - 1975: हैजा महामारी (Cholera pandemic)

    1817 के बाद से, विब्रियो कोलेरा (बैक्टीरिया का एक प्रकार) वैश्विक रूप से हैजा की महामारी का कारण बना. 5 साल की समयावधि के भीतर, यह वायरस एशिया के कुछ हिस्सों में फैल गया जहां से यह बांग्लादेश और भारत तक पहुंचा. कोलकाता में खराब जल संचय प्रणाली ने इस शहर को भारत में हैजा की महामारी का केंद्र बना दिया था.

    1968 - 1969: फ्लू महामारी (Flu Pandemic)

    1968 में, फ्लू, इन्फ्लूएंजा ए वायरस के H3N2 स्ट्रेन के कारण हांगकांग में फैला और दो महीने के भीतर भारत पहुंच गया. वियतनाम युद्ध के बाद वियतनाम से लौट रहे अमेरिकी सैनिक इस वायरस के शिकार बन गए थे.

    1974: चेचक महामारी (Smallpox Epidemic)

    चेचक, दो वायरस वेरिएंट में से किसी एक के कारण होता था: वैरियोला मेजर या वेरोला माइनर. रिपोर्टों के अनुसार, विश्व में चेचक के 60% मामले भारत में रिपोर्ट किए गए थे और दुनिया के अन्य हिस्सों की तुलना में अधिक विषैले थे.

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    इस खतरनाक स्थिति से छुटकारा पाने के लिए, भारत ने राष्ट्रीय चेचक उन्मूलन कार्यक्रम (NSEP) शुरू किया था, लेकिन यह कार्यक्रम वांछित परिणाम प्राप्त करने में विफल रह था. इस भयावह स्थिति में भारत की मदद करने के लिए, सोवियत संघ के साथ WHO ने भारत को कुछ चिकित्सा सहायता भेजी और मार्च 1977 में भारत चेचक से मुक्त हुआ था.

    1994: सूरत में प्लेग (Plague in Surat)

    सितंबर 1994 में, न्यूमोनिक प्लेग ने सूरत में दस्तक दी जिसके कारण बड़ी संख्या में लोग इस शहर को छोड़कर अन्य शहरों में भाग गये जिसके कारण यह भारत के अन्य शहरों में भी फ़ैल गया था.

    अफवाहों और गलत इलाज़ की अफवाहों ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया था. लोगों के सामानों की होर्डिग घर में कर ली जिससे अन्य लोगों के सामने खाद्य संकट पैदा हो गया था.

    प्लेग का मुख्य कारण; शहर में खुली नालियों, खराब सीवेज प्रणाली आदि थी. हालांकि, सूरत की स्थानीय सरकार ने कचरा साफ किया और नालियों को खोला, और  इस प्रकार प्लेग के फैलाव पर नियंत्रण पाया.

    2002 - 2004: सार्स 

    21वीं सदी में, सार्स पहली गंभीर बीमारी थी जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलने वाली थी. यह एक गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम (acute respiratory syndrome) था और सार्स का कारण COVID-19 के समान था, जिसे SARS CoV नाम दिया गया था. यह वायरस लगातार उत्परिवर्तन (mutations) के लिए जाना जाता था और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में खांसी और छींकने के माध्यम से फैलता था.

    2006: डेंगू और चिकनगुनिया का प्रकोप (Dengue and Chikungunya Outbreak)

    डेंगू और चिकनगुनिया का प्रकोप दोनों ही मच्छर जनित विशिष्ट रोग थे और देश के विभिन्न हिस्सों में पानी के ठहराव ने इन मच्छरों के लिए प्रजनन आधार प्रदान किया. इन्होने पूरे भारत में लोगों को प्रभावित किया था. इन प्रकोपों के कारण देश के कई हिस्से प्रभावित हुए और राष्ट्रीय राजधानी यानी दिल्ली में सबसे अधिक मरीज सामने आए थे.

    2009: गुजरात हेपेटाइटिस का प्रकोप (Gujarat Hepatitis Outbreak)

    गुजरात में फरवरी 2009 में बहुत से लोग हेपेटाइटिस बी से संक्रमित थे जो संक्रमित रक्त और अन्य तरल पदार्थों के शरीर में संचरण के कारण फैला था. ऐसा माना जाता है कि गुजरात के स्थानीय डॉक्टरों ने दूषित और इस्तेमाल किए गए सिरिंज का प्रयोग किया था जिसके कारण यह रोग फैला था.

    2014 - 2015: ओडिशा में पीलिया का प्रकोप (Jaundice Outbreak,Odisha)

    ओडिशा में सितंबर 2014 में पीलिया का प्रकोप देखा गया था और इसका मुख्य कारण दूषित पानी था. रिपोर्टों के अनुसार, पीने के पानी की पाइपलाइनों में गन्दा पानी प्रवेश कर गया जो कि इस बीमारी का कारण बना था.

    2014-2015: स्वाइन फ्लू का प्रकोप (Swine flu outbreak)

    2014 के अंतिम महीनों के दौरान, H1V1 वायरस की कई रिपोर्टें उठने लगीं. स्वाइन फ्लू एक प्रकार का इन्फ्लूएंजा वायरस है और 2014 में, गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, महाराष्ट्र और तेलंगाना वायरस के कारण सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में से थे. मार्च 2015 तक कई सार्वजनिक जागरूकता अभियान के बाद भी, देश भर में लगभग 33,000 मामले सामने आए और लगभग 2000 लोगों ने अपनी जान गंवाई.

    2017: एन्सेफलाइटिस का प्रकोप (Encephalitis outbreak)

    मच्छरों के काटने के कारण, 2017 में, उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर में सैकड़ों बच्चों की मौत हो गयी थी. जापानी इंसेफेलाइटिस और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम से इन बच्चों की मौत हो गई थी. इन दोनों वायरल संक्रमणों से मस्तिष्क की सूजन होती है, जिसके परिणामस्वरूप शारीरिक विकलांगता होती है और कुछ मामलों में मृत्यु भी हो जाती है.

    2018: निपाह वायरस का प्रकोप (Nipah Virus outbreak)

    मई 2018 में, केरल में चमगादड़ों के कारण संक्रमण शुरू हुआ था. वायरस के व्यापक प्रसार के कुछ दिनों के भीतर, राज्य सरकार ने वायरस के प्रसार को कम करने के लिए कई सुरक्षात्मक उपायों को लागू किये था. निवारक उपायों के कारण, जून के महीने तक केरल में इस पर अंकुश लग गया था.

    2019: कोरोनावायरस (Coronavirus)

    कोरोनावायरस रोग (COVID-19) एक नयी बीमारी है जो 2019 में शुरू हुई थी. इसके  संक्रमण के सामान्य संकेतों में श्वसन संबंधी लक्षण, बुखार, खांसी, सांस लेने में तकलीफ और सांस लेने में कठिनाई शामिल हैं. अधिक गंभीर मामलों में, संक्रमण निमोनिया, गंभीर तीव्र श्वसन सिंड्रोम, गुर्दे की विफलता और यहां तक कि मृत्यु का कारण बन सकता है. अब तक इससे 192 देशों में लगभग 14800 लोगों की मृत्यु हो चुकी है.

    तो ये थे 1990 के दशक के बाद से भारत में फैले अब तक के प्रमुख प्रकोप. यदि उचित स्वच्छता और संयमित दिनचर्या अपनायी जाये तो इन में से कई रोगों को ठीक किया जा सकता है.


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