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भारत के प्रसिद्ध पारंपरिक नाटक या लोकनाट्य की सूची

02-AUG-2018 15:35
Famous Traditional Dramas or Theatres of India HN

भारत में विभिन्न सामाजिक और धार्मिक अवसरों के दौरान पर बृहद पारंपरिक नाटक या लोकनाट्य किया जाता है जिसको ग्रामीण या गांव का रंग-मंच बोला जाता है। यह पारंपरिक नाटक या लोकनाट्य भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण तथा धारणाओं को दर्शाता है।

मध्ययुगीन भारत के दौरान पारंपरिक नाटक या लोकनाट्य बहुत प्रसिद्ध था। रंग-मंच के इस रूप में नृत्य की विशेष शैलियों द्वारा आम लोगो के जीवन शैली को दर्शाया जाता था।

पारंपरिक रूप से स्थानीय भाषा में सृजनात्‍मकता सूत्रबद्ध रूप में या शास्‍त्रीय तरीके से नहीं, बल्की बिखरे, छितराये, दैनिक जीवन की आवश्‍यकताओं के अनुरूप होती है । जीवन के सघन अनुभवों से जो सहज लय उत्‍पन्‍न होती है, वही अंतत: लोकनाटक बन जाती है। उसमें दु:ख, सुख, हताशा, घृणा, प्रेम आदि मानवीय प्रसंग का संयोग होता है।

भारत के प्रसिद्ध पारंपरिक नाटक या लोकनाट्य

1. यात्रा / जात्रा (Yatra/Jatra)

यह पूर्वी भारत का धार्मिक लोकनाट्य है। इस लोकनाट्य की उत्पत्ति आंतरिक रूप श्री चैतन्य के भक्ति आंदोलन के उदय के लिए श्रेय दिया जाता है, जिसमें रुक्मिनी हरण को नाटक के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। ओडिशा में जात्रा लोकनाट्य में संगीत के साथ प्रस्तुत किया जाता है। हालांकि पारंपरिक और ग्रामीण शैली के साथ शुरू किया गया था, आज यह वाणिज्यिक और उपनगरीय बन गया है।

2. रामलीला (Ramleela)

इस लोकनाट्य की शुरवात तुलसीदास ने मुग़ल काल काशी में किया था। इस नाटक का विषय रामायण की कहानी है, जो दशहरा के दौरान खेला जाता है। यह अमीर, गरीब, बूढ़े या छोटे लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय है। यहां तक कि यह जावा, सुमात्रा और इंडोनेशिया में भी प्रसिद्ध है।

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3. रासलीला (Raasleela)

इस लोकनाट्य में युवा और बालक कृष्ण की गतिविधियों का नाट्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसे जन्माष्टमी के मौके पर कान्हा की इन सारी अठखेलियों को एक धागे में पिरोकर यानी उनको नाटकीय रूप देकर रासलीला या कृष्ण लीला खेली जाती है। इसीलिए जन्माष्टमी की तैयारियों में श्रीकृष्ण की रासलीला का आनन्द मथुरा, वृंदावन तक सीमित न रह कर पूरे देश में छा जाता है। जगह-जगह रासलीलाओं का मंचन होता है, जिनमें सजे-धजे श्री कृष्ण को अलग-अलग रूप रखकर राधा के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त करते दिखाया जाता है।

4. स्वांग (Swang)

यह पंजाब, हरियाणा, ओडिशा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और बंगाल के ग्रामीण इलाको में बहुत प्रसिद्ध है । भावनाओं की नर्मता, संवाद की तीव्रता और विशिष्ट परिधान इस रंगमंच की कुछ विशेषताएं हैं। स्वंग की दो महत्वपूर्ण शैलियों रोहतक और हाथरस से हैं। रोहतक शैली में, हरियाणावी (बंगरू) भाषा का प्रयोग होता है और हाथरस शैली में ब्राज भाषा का प्रयोग होता है।

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5. नौटंकी (Nautanki)

यह उत्तर भारत का एक प्रसिद्ध पारंपरिक लोकनाट्य है। ऐसा कहा जाता है कि इस शैली को रंगमंच के 'भगत' रूप से विकसित किया गया था जो लगभग 400 वर्ष पुराना है, जबकि 'नॉटंकी' शब्द केवल 19वीं शताब्दी में अस्तित्व में आया है।  

6. दशावतार (Dashavatar)

यह कोंकण व गोवा क्षेत्र का सबसे विकसित और प्रसिद्ध लोकनाट्य है। प्रस्‍तोता पालन व सृजन के देवता-भगवान विष्‍णु के दस अवतारों (जैसे मत्‍स्‍य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्‍ण (या बलराम), बुद्ध व कल्कि) को प्रस्‍तुत करते हैं । शैलीगत साजसिंगार से परे दशावतार का प्रदर्शन करने वाले लकड़ी व पेपरमेशे का मुखौटा पहनते हैं ।

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 7. करियाला (Kariyala)

यह हिमाचल प्रदेश का सबसे दिलचस्प और लोकप्रिय लोकनाट्य है, खासकर शिमला, सोलन और सिमोर में। इसका प्रदर्शन मनोरंजक नाट्य श्रृंखला में मेले और उत्सव के अवसरों के दौरान की जाती है।

8. ख्याल (Khyal)

यह हिंदुस्तानी लोक नृत्य नाटक और राजस्थानी लोकनाट्य में एक है। वे विशेष रूप से पुरुषों द्वारा किए जाता हैं। इसका प्रदर्शन लय खंड और स्ट्रिंग यंत्र ख्याल के संयोग से किया जाता है। ख्याल के पेशेवर नर्तकियों को 'भवनी' के नाम से जाना जाता है। यह सामाजिक, ऐतिहासिक, धार्मिक और प्यार पर आधारित होता है। हालांकि यह विलुप्त होने की कगार पर है।

9. तमाशा (Tamasha)

तमाशा भारत के लोक नाटक का श्रृंगारिक रूप है, जो पश्चिम भारत के महाराष्ट्र राज्य में 16वीं शताब्दी में शुरू हुआ था। अन्य सभी भारतीय लोक नाटकों में प्रमुख भूमिका में प्राय: पुरुष होते हैं, लेकिन तमाशा में मुख्य भूमिका महिलाएँ निभाती हैं। उन्हें मुर्की के नाम से जाना जाता है। 20वीं सदी में तमाशा व्यावसायिक रूप से बहुत सफल हुआ। तमाशा महाराष्ट्र में प्रचलित नृत्यों, लोक कलाओं इत्यादि को नया आयाम देता है। यह अपने आप में एक विशिष्ट कला है।

10. ओट्टन थुलाल (Ottan Thullal)

यह केरल का नृत्य और काव्य संयोजन वाला लोकप्रिय लोकनाट्य है। जिसे 18वीं शताब्दी में कुचन नंबियार (तीन प्रसिद्ध मलयालम भाषा के कवियों में से एक) द्वारा आरंभ किया गया था। गायन, स्टाइलिज्ड मेकअप और मुखौटा लगा चेहरा इस रंगमंच की कुछ विशेषताएं हैं।

11. तेरुक्कुट्टू (Terukkutto)

यह तमिलनाडु का लोकप्रिय लोकनाट्य है। इसका प्रदर्शन वर्षा की देवी मरिअम्मा को खुश करने के लिए जाता है। यह मनोरंजन, अनुष्ठान, और सामाजिक निर्देश का एक माध्यम है।

12. भाम कलापम (Bham Kalapam)

यह आंध्र प्रदेश का एक प्रसिद्ध लोकनाट्य है। यह वेश्या-नर्तकियों से नृत्य की पवित्रता को बनाए रखने के लिए 16वीं शताब्दी में सिद्धेंद्र योगी द्वारा लिखा गया था। इसमें कुचीपुडी नृत्य जिस तरह से हाव-भाव तथा चेहरे की अभिव्यक्ति का इस्तेमाल किया जाता ठीक वासी ही इस लोकनाट्य में किया जाता है।

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