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नाथ सम्प्रदाय की उत्पति, कार्यप्रणाली एवं विभिन्न धर्मगुरूओं का विवरण

Nikhilesh Mishra13-FEB-2018 14:43
Origin and Methodology of the Naath Community

भारत में जब तांत्रिकों और साधकों के चमत्कार एवं आचार-विचार की बदनामी होने लगी और साधकों को शाक्त, मद्य, मांस तथा स्त्री-संबंधी व्यभिचारों के कारण घृणा की दृष्टि से देखा जाने लगा तथा इनकी यौगिक क्रियाएँ भी मन्द पड़ने लगी, तब इन यौगिक क्रियाओं के उद्धार के लिए नाथ सम्प्रदाय का उदय हुआ थाl नाथ सम्प्रदाय हिन्दू धर्म के अंतर्गत शैववाद की एक उप-परंपरा हैl यह एक मध्ययुगीन आंदोलन है जो शैव धर्म, बौद्ध धर्म और भारत में प्रचलित योग परंपराओं का सम्मिलित रूप हैl
नाथ सम्प्रदाय के अनुयायी आदिनाथ या शिव को अपना पहला भगवान या गुरू मानते हैंl शिव के अलावा कई अन्य व्यक्तियों को नाथ सम्प्रदाय में गुरू माना जाता है जिनमें मच्छेन्द्रनाथ और गोरक्षनाथ (गोरखनाथ) प्रमुख हैंl इस लेख में हम नाथ शब्द का अर्थ, नाथ सम्प्रदाय की उत्पति, उसके प्रमुख गुरूओं तथा इस सम्प्रदाय के क्रियाकलापों का विवरण दे रहे हैंl

नाथ शब्द का अर्थ:
 Navnath
Image source: Google Sites 
संस्कृत के शब्द “नाथ” का शाब्दिक अर्थ "प्रभु” या  “रक्षक" है जबकि इससे संबंधित संस्कृत शब्द “आदिनाथ” का अर्थ “प्रथम” या “मूल” भगवान है और यह नाथ सम्प्रदाय के संस्थापक शिव के लिए प्रयुक्त होता हैl शब्द '' नाथ '' उस नाम से जाना जाने वाला शैववाद परंपरा के लिए एक नवाचार है। 18 वीं सदी से पहले नाथ सम्प्रदाय के लोगों को “जोगी या योगी” कहा जाता था। हालांकि औपनिवेशिक शासन के दौरान “योगी/जोगी" शब्द का उपयोग ब्रिटिश भारत की जनगणना के दौरान “निम्न स्थिति वाली जाति” के लिए किया जाता थाl 20वीं शताब्दी में इस समुदाय के लोगों ने अपने नाम के अंत में वैकल्पिक शब्द “नाथ” का इस्तेमाल करना शुरू किया जबकि अपने ऐतिहासिक शब्द “योगी या जोगी” का प्रयोग अपने समुदाय के भीतर एक-दूसरे को संदर्भित करने के लिए करते हैं। नाथ शब्द का प्रयोग वैष्णववाद (जैसे गोपीनाथ, जगन्नाथ) और जैन धर्म (आदिनाथ, पार्श्वनाथ) में भी किया जाता ह

नाथ सम्प्रदाय की उत्पति:
भारत में नाथ परंपरा की शुरूआत कोई नया आंदोलन नहीं था बल्कि यह “सिद्ध परंपरा” का एक विकासवादी चरण था। “सिद्ध परंपरा” ने योग का पता लगाया, जिसमें मनोवैज्ञानिक एवं शारीरिक तकनीकों के सही संयोजन से सिद्धि की प्राप्ति होती हैl मल्ललिन्सन के अनुसार, “पुरातात्विक सन्दर्भों और शुरूआती ग्रंथों से पता चलता है कि मच्छेन्द्रनाथ और गोरक्षनाथ का संबंध प्रायद्वीपीय भारत के दक्कन क्षेत्र से था जबकि अन्य लोगों का संबंध पूर्वी भारत से हैंl” नाथ सम्प्रदाय के योगी की सबसे पुरानी प्रतिमा कोंकण क्षेत्र में पाई गई हैl विजयनगर साम्राज्य के कलाकृतियों में उन्हें शामिल किया गया थाl  मा-हुन नामक चीनी यात्री, जिसने भारत के पश्चिमी तट का दौरा किया था अपने संस्मरण में नाथ योगियों का उल्लेख किया हैl नाथ परंपरा के सबसे पुराने ग्रंथो में इस बात का उल्लेख किया गया है कि नाथ सम्प्रदाय के अधिकांश तीर्थस्थल दक्कन क्षेत्र और भारत के पूर्वी राज्य में स्थित हैंl इन ग्रंथों में उत्तर, उत्तर-पश्चिम या दक्षिण भारत का कोई भी उल्लेख नहीं हैl
नाथ गुरूओं की संख्या के बारे में विभिन्न ग्रंथों में मतभेद है और विभिन्न धर्मग्रंथों के अनुसार नाथ सम्प्रदाय में क्रमशः 4, 9, 18, 25 और इससे भी अधिक धर्म गुरू थेl सबसे पहला ग्रन्थ जिसमें नौ नाथ गुरूओं का उल्लेख किया गया है वह 15वीं शताब्दी का तेलुगू ग्रन्थ “नवनाथ चरित्र” है। प्राचीनकाल के अलग-अलग धर्मग्रंथों में नाथ गुरूओं को अलग-अलग नाम से उल्लिखित किया गया हैl उदाहरण के लिए, मच्छेन्द्रनाथ को 10वीं शताब्दी में लिखित अद्वैतवाद के ग्रन्थ “तंत्रलोक” के अध्याय 29.32 में “सिद्ध” के रूप में और शैव धर्म के विद्वान अभिनवगुप्त के रूप में उल्लेख किया गया हैl
तिब्बत और हिमालय के क्षेत्रों में पाये गये बौद्ध ग्रंथों में नाथ गुरूओं को “सिद्ध” गुरु के रूप में उल्लेख किया गया था और शुरूआती विद्वानों का मानना था कि नाथ गुरू मूल रूप से बौद्ध हो सकते हैं, लेकिन नाथ सिद्धांत और धर्मशास्त्र बौद्ध धर्म की विचारधारा से बिलकुल अलग हैंl तिब्बती परंपरा में मच्छेन्द्रनाथ को “लुई-पे” के नाम से पहचाना जाता है, जिन्हें पहला “बौद्ध सिद्धाचार्य” के रूप में जाना जाता है। नेपाल में उन्हें बौद्ध “अवलोकीतेश्वर” के रूप में जाना जाता हैl भक्ति आंदोलन से जुड़े संत कबीर ने भी नाथ योगियों की प्रशंसा की हैl

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नाथ सम्प्रदाय के प्रमुख गुरूओं की सूची:
 chaurasi naath siddhas
Image source: Adesh
आदिगुरू: भगवान शिव (हिन्दू देवता)
मच्छेन्द्रनाथ: 9वीं या 10वीं सदी के योग सिद्ध, "कौला तंत्र" परंपराओं और अपरंपरागत प्रयोगों के लिए मशहूर
गोरक्षनाथ (गोरखनाथ): 11वीं या 12वीं शताब्दी में जन्म, मठवादी नाथ संप्रदाय के संस्थापक, व्यवस्थित योग तकनीकों, संगठन , हठ योग के ग्रंथों के रचियता एवं निर्गुण भक्ति के विचारों के लिए प्रसिद्ध
जलंधरनाथ: 13वीं सदी के सिद्ध, मूल रूप से जालंधर (पंजाब) निवासी, राजस्थान और पंजाब क्षेत्र में ख्यातिप्राप्त
कन्हापनाथ: 10वीं सदी के सिद्ध, मूल रूप से बंगाल निवासी, नाथ सम्प्रदाय के भीतर एक अलग उप-परंपरा की शुरूआत करने वाले
चौरंगीनाथ: बंगाल के राजा देवपाल के पुत्र, उत्तर-पश्चिम में पंजाब क्षेत्र में ख्यातिप्राप्त, उनसे संबंधित एक तीर्थस्थल सियालकोट (अब पाकिस्तान में) में हैl
चरपाथनाथ: हिमाचल प्रदेश के चंबा क्षेत्र में हिमालय की गुफाओं में रहने वाले, उन्होंने अवधूत का प्रतिपादन किया और बताया कि व्यक्ति को अपनी आन्तरिक शक्तियों को बढ़ाना चाहिए क्योंकि बाहरी प्रथाओं से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता हैl
भर्तृहरिनाथ: उज्जैन के राजा और विद्वान जिन्होंने योगी बनने के लिए अपना राज्य छोड़ दियाl
गोपीचन्दनाथ: बंगाल की रानी के पुत्र जिन्होंने अपना राजपाट त्याग दिया थाl
रत्ननाथ: 13वीं सदी के सिद्ध, मध्य नेपाल और पंजाब में ख्यातिप्राप्त, उत्तर भारत में नाथ और सूफी दोनों सम्प्रदाय में आदरणीय
धर्मनाथ: 15वीं सदी के सिद्ध, गुजरात में ख्यातिप्राप्त, उन्होंने कच्छ क्षेत्र में एक मठ की स्थापना की थी, किंवदंतियों के अनुसार उन्होंने कच्छ क्षेत्र को जीवित रहने योग्य बनायाl
मस्तनाथ: 18वीं सदी के सिद्ध, उन्होंने हरियाणा में एक मठ की स्थापना की थीl

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नाथ सम्प्रदाय की कार्यप्रणाली:
 gorakh naath
Image source: www.pinterest.com
इस सम्प्रदाय के परम्परा संस्थापक आदिनाथ स्वयं शंकर के अवतार माने जाते हैं। इसका संबंध रसेश्वरों से है और इसके अनुयायी आगमों में आदिष्ट योग साधन करते हैंl अतः इसे अनेक इतिहासकार शैव सम्प्रदाय मानते हैंl परन्तु और शैवों की तरह ये न तो लिंग की पूजा करते हैं और न शिवोपासना और अंगों का निर्वाह करते हैंl किन्तु तीर्थ, देवता आदि को मानते हैं, शिवमंदिर और देवीमंदिरों में दर्शनार्थ जाते हैंl कैला देवी जी तथा हिंगलाज माता के दर्शन विशेष रूप से करते हैं, जिससे इनका शाक्त संबंध भी स्पष्ट है। योगी भस्म भी
रमाते हैंl योगसाधना इस सम्प्रदाय के शुरूआत, मध्य और अंत में हैं। अतः इसे शैव मत का शुद्ध योग सम्प्रदाय माना जाता है।
इस पंथ वालों की योग साधना पातंजल विधि का विकसित रूप है। नाथपंत में ‘ऊर्ध्वरेता’ या अखण्ड ब्रह्मचारी होना सबसे महत्व की बात है। मांस-मद्द आदि सभी तामसिक भोजनों का पूरा निषेध है। यह पंथ चौरासी सिद्धों के तांत्रिक वज्रयान का सात्विक रूप में परिपालक प्रतीत होता है।
उनका तात्विक सिद्धांत है कि परमात्मा ‘केवल एक’ है और उसी परमात्मा तक पहुँचना मोक्ष है। जीव का उससे चाहे जैसा संबंध माना जाए, परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से उससे सम्मिलन ही “कैवल्य मोक्ष या योग” है। इसी जीवन में उसकी अनुभूति हो जाए यही इस पंथ का लक्ष्य है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रथम सीढ़ी काया की साधना है। कोई काया को शत्रु समझकर भाँति-भाँति के कष्ट देता है और कोई विषयवासना में लिप्त होकर उसे अनियंत्रित छोड़ देता है। परन्तु नाथपंथी काया को परमात्मा का आवास मानकर उसकी उपयुक्त साधना करता है। काया उसके लिए वह यंत्र है जिसके द्वारा वह इसी जीवन में मोक्षानुभूति कर लेता है, जन्म मरण जीवन पर पूरा अधिकार कर लेता है, जरा-भरण-व्याधि और काल पर विजय पा जाता है।
इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह पहले काया शोधन करता है। इसके लिए वह यम, नियम के साथ हठयोग के षट् कर्म(नेति, धौति, वस्ति, नौलि, कपालभांति और त्राटक) करता है ताकि काया शुद्ध हो जाए।

हठ योग:
 Hatha Yoga
Image source: Atri Yoga Center
इस मत में शुद्ध हठयोग तथा राजयोग की साधनाएँ अनुशासित हैं। योगासन, नाड़ीज्ञान, षट्चक्र निरूपण तथा प्राणायाम द्वारा समाधि की प्राप्ति इसके मुख्य अंग हैं। शारीरिक पुष्टि तथा पंच महाभूतों पर विजय की सिद्धि के लिए रसविद्या का भी इस मत में एक विशेष स्थान है। इस पंथ के योगी या तो जीवित समाधि लेते हैं या शरीर छोड़ने पर उन्हें समाधि दी जाती है। वे जलाये नहीं जाते। यह माना जाता है कि उनका शरीर योग से ही शुद्ध हो जाता है अतः उसे जलाने की आवश्यकता नहीं हैl नाथपंथी योगी अलख(अलक्ष) जगाते हैं। इसी शब्द से इष्टदेव का ध्यान करते हैं और इसी से भिक्षाटन भी करते हैं। इनके शिष्य गुरू के ‘अलक्ष’ कहने पर ‘आदेश’ कहकर सम्बोधन का उत्तर देते हैं। इन मंत्रों का लक्ष्य वहीं प्रणवरूपी परम पुरूष है जो वेदों और उपनिषदों का ध्येय हैं।

नाथ सम्प्रदाय के प्रमुख ग्रंथ:
 gheranda samhita
Image source: Motilal Banarsidass
नाथपंथी जिन ग्रंथों को प्रमाण मानते हैं उनमें सबसे प्राचीन हठयोग संबंधी ग्रंथ घेरण्डसंहिता और शिवसंहिता है। गोरक्षनाथकृत हठयोग, गोरक्षनाथकृत ज्ञानामृत, गोरक्षकल्प सहस्त्रनाम, चतुरशीत्यासन, योगचिन्तामणि, योगमहिमा, योगमार्तण्ड, योगसिद्धांत पद्धति, विवेकमार्तण्ड, सिद्धसिद्धांत पद्धति, गोरखबोध, दत्त-गोरख संवाद,  गोरखनाथजी द्वारा रचित पद, गोरखनाथ के स्फुट ग्रंथ, ज्ञानसिद्धांत योग, ज्ञानविक्रम, योगेश्वरी साखी, नरवैबोध, विरहपुराण और गोरखसार ग्रंथ आदि भी नाथ सम्प्रदाय के प्रमाणिक ग्रंथ हैं।

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