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कोर्ट मार्शल किसे कहते हैं और इसकी क्या प्रक्रिया होती है?

कोर्ट मार्शल एक तरह की कोर्ट होती है. जो खास आर्मी कर्मचारियों के लिए होती है. इसका काम आर्मी में अनुशासन तोड़ने या अन्य अपराध करने वाले आर्मी मैन पर केस चलाना, उसकी सुनवाई करना और सजा सुनाना होता है. ये ट्रायल मिलिट्री कानून के तहत होता है. इस कानून में 70 तरह के अपराधों के लिए सजा का प्रावधान है.
Apr 2, 2019 11:38 IST
Court Martial

सेना में बहादुरी के साथ साथ जिस चीज की सबसे ज्यादा जरुरत होती है वह है अनुसाशन. सेना द्वारा किसी भी ऑपरेशन को सफल बनाने के लिए अनुशासन का पालन करना बहुत जरूरी होता है. जब सेना को कोई जवान या अधिकारी नियमों को तोड़ता है तो उसके अपराध के हिसाब से उसे सजा दी जाती है. इन्हीं सजाओं में से एक होती है कोर्ट मार्शल की सजा.

भारतीय सेना के तीन मुख्य अंग हैं; 1). थल सेना 2). नौसेना और 3) वायु सेना. इन तीनों सेनाओं के अपने अलग - अलग नियम हैं. किसी देश के खिलाफ युद्ध में सेना के इन तीनों अंगों की अपनी अलग अलग भागीदारी होती है.

आइये इस लेख में कोर्ट मार्शल के बारे में जानते हैं;

ज्ञातव्य है कि भारतीय सेना अभी भी ब्रिटिश द्वारा बनायी गयी सैन्य न्याय की व्यवस्था का पालन कर रही है हालाँकि ब्रिटेन ने इसमें परिवर्तन कर लिया है. भारत में 1857के विद्रोह के पहले कोर्ट मार्शल जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी लेकिन इस विद्रोह के बाद सेना में अनुशासन बढ़ाने के लिए आर्मी कोर्ट की स्थापना की गयी और सेना के कमांडेंट को यह अधिकार दिया गया कि वह कानून तोड़ने वाले व्यक्ति को दंड दे.

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कोर्ट मार्शल क्या होता है?

थल सेना में किया जाने वाला कोर्ट मार्शल सेना अधिनियम,1950 के मुताबिक किया जाता है. इसमें दुष्कर्म, हत्या तथा गैर इरादतन हत्या के मामलों में कोर्ट मार्शल नहीं किया जाता है क्योंकि ऐसे मामलों को सिविल पुलिस को सौंप दिया जाता है हालाँकि आर्मी भी अपने स्तर पर जाँच करती है. लेकिन जम्मू-कश्मीर या पूर्वोत्तर में सेना चाहे तो ऐसे मामले अपने हाथ में ले सकती है. इसमें त्वरित सुनवाई कर आरोपी को सजा देने का प्रावधान है.जम्मू कश्मीर में मेजर गोगोई को अनुशासनहीनता के कारण कोर्ट मार्शल का सामना करना पड़ा है और अब उन्हें जल्दी ही सजा सुनाई जा सकती है.

court martial MAJOR gogoi

भारतीय वायु सेना, वायु सेना अधिनियम, 1950 द्वारा शासित है और कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया इसी के द्वारा निर्धारित होती है जबकि भारतीय नौसेना को नौसेना अधिनियम, 1957 द्वारा शासित किया जाता है और किसी नौसेना कर्मी के खिलाफ कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया इसी के तहत पूरी की जाती है.

कोर्ट मार्शल निम्न निम्न दशाओं में लिए गए अपराध के लिए किया जाता है;

1. जब व्यक्ति सेवा में हो

2. भारत के बाहर हो

3. सीमा पर हो (सीमा से भाग जाना इत्यादि)

कोर्ट मार्शल एक तरह की कोर्ट होती है. जो खास आर्मी कर्मचारियों के लिए होती है. इसका काम आर्मी में अनुशासन तोड़ने या अन्य अपराध करने वाले आर्मी मैन पर केस चलाना, उसकी सुनवाई करना और सजा सुनाना होता है. ये ट्रायल मिलिट्री कानून के तहत होता है. इस कानून में 70 तरह के अपराधों के लिए सजा का प्रावधान है.

कोर्ट मार्शल मुख्य रूप से 4 प्रकार का होता है. लेकिन तीनों सेनाओं में इसे विभिन्न कानूनों के तहत किया जाता है.

1. जनरल कोर्ट मार्शल (General Court Marshal): इसमें जवान से लेकर अफसर तक सभी जवानों को दंडित करने का अधिकार होता है. इसमें जज के अलावा 5 से 7 लोगों का पैनल होता है. ये कोर्ट दोषी को सैन्य सेवा से बर्खास्त, अजीवन प्रतिबंध या फांसी की सजा तक दे सकती है. साथ ही इसमें युद्ध के दौरान अपनी पोस्ट छोड़कर भागने वाले सैन्य कर्मियों को भी फांसी देने का प्रावधान है.

2. डिस्ट्रिक्ट कोर्ट मार्शल (District Court Marshal): यह कोर्ट सिपाही से जेसीओ लेवल के लिए होती है इसमें 2 से 3 मेंबर मिलकर सुनवाई करते हैं. इसमें अधिकतम 2 साल की सजा होती है.

3. समरी जनरल कोर्ट मार्शल (Summary General Court Marshal): जम्मू-कश्मीर जैसे प्रमुख फील्ड इलाके में अपराध करने वाले सैन्य कर्मियों के लिए होती है। इसमें बहुत तेजी से निर्णय आता है.

4. समरी कोर्ट मार्शल (Summary Court Marshal): इसमें सबसे निचले तरह की सैन्य अदालत में केस चलता है. इसमें सिपाही से एनसीओ तक के पद वाले लोगों का केस सुना जाता है और अधिकतम 2 साल की सजा देने का प्रावधान है.

कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी होती है?

1. जाँच अदालत का गठन (Constitution of Court of Enquiry): सेना में किसी तरह का अपराध या अनुशासनहीनता होने पर सबसे पहले कोर्ट ऑफ इंक्वायरी के आदेश जारी होते "हैं. जांच में जवान या अफसर पर लगाए गए आरोप सही साबित होने और गंभीर मामला होने पर जांच अधिकारी तुरंत ही सजा दे सकता है. इसके अलावा बड़ा मामला होने पर केस ‘समरी ऑफ एविडेंस’ को भेज दिया जाता है.

2. गवाही का सारांश (summary of evidence): प्रारंभिक जांच में दोष सिद्ध होने पर सक्षम अधिकारी मामले के लिए और सबूत जुटाने के लिए जांच करता है और अगर सबूत मिल जाते हैं तो आरोपी को तुरंत सजा देने का भी प्रावधान है. इस दौरान सभी कानूनी दस्तावेज एकत्रित होते है. जांच पीठासीन अधिकारी तुरंत सजा या कोर्ट मार्शल का आदेश करता है.

3. कोर्ट मार्शल: कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया शुरू होते ही आरोपी सैन्य अफसर या कार्मिक को आरोप की प्रति देकर उसे अपना वकील नियुक्त करने का अधिकार दिया जाता है.

डिस्ट्रिक्ट कोर्ट मार्शल में सुनाई गई सजा को लेकर सेशन कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. वहीं, कोर्ट मार्शल में सुनाए गए फैसले को आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल (AFT) में चुनौती दी जा सकती है और अंत में आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.

कोर्ट मार्शल में कौन-कौन सी सजा दी जा सकती है (यह सजा जुर्म के लेवल पर तय होती है)

1. आरोपी की नौकरी छीनी जा सकती है साथ ही उसे भविष्य में मिलने वाले सभी तरह के लाभ जैसे एक्स सर्विसमैन बेनिफिट, पेंशन, कैंटीन बेनिफिट खत्म किए जा सकते हैं.

2. जुर्म की संगीनता के आधार पर फांसी, उम्रकैद या एक तय समयावधि के लिए सजा सुनाई जा सकती है.

3. प्रमोशन रोका जा सकता है, वेतन वृद्धि, पेंशन रोकी जा सकती है. अलाउंसेज खत्म किए जा सकते हैं और जुर्माना लगाया जा सकता है. 

4. रैंक कम करके लोअर रैंक और ग्रेड की जा सकती है.

ऊपर दिए गए तथ्यों से स्पष्ट है कि सेना के तीनों अंगों में अनुसाशन का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है. यदि कोई सैनिक इस अनुसाशन को तोड़ने की कोशिश करता है तो उसको कोर्ट मार्शल जैसी भयानक सजा से गुजरना पड़ सकता है.

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