व्यावसायिक बैंकों द्वारा ऋण का सर्जन किस प्रकार किया जाता है?

इस लेख में माध्यम से आप यह जानेंगे कि किस प्रकार व्यावसायिक बैंक छोटी छोटी बचतों के माध्यम से एक बहुत बड़ी राशि जमा कर लेते हैं और इस जमा को अन्य लोगों को उधार देकर बहुत सा लाभ कमाते हैं. यह लेख बैंकों की उधार देने की प्रक्रिया को भी बताता है.
Created On: Oct 17, 2017 11:24 IST
Personal loan
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क्या आपके दिमाग में कभी यह सवाल आया है कि बैंक किस प्रकार लोगों की छोटी छोटी बचतों को जमा करके एक बहुत बड़ी राशि अपने पास जमा कर लेते हैं. यहाँ पर यह बताना जरूरी है कि मार्च 2017 में भारतीय स्टेट बैंक के पास कुल जमा संपत्ति 20,44,751 करोड़ थी और कुल देयताएं 27,05,966 करोड़ थीं. क्या आप यह अनुमान  लगा सकते हैं कि भारतीय स्टेट बैंक के पास इतनी जमा संपत्ति कैसे आई.
जबकि उसकी देनदारी तो उसे भी ज्यादा है.
आइये इस लेख में यह जानने का प्रयास करते हैं कि बैंक के पास इतनी अधिक मात्रा में संपत्ति कैसे जमा हो जाती है और बैंक इस जमा संपत्ति का क्या करता है और इससे किस प्रकार लाभ कमाता है.
व्यापारिक बैंक जमा स्वीकार करने तथा ऋण देने की प्रक्रिया के दौरान साख मुद्रा का सृजन करते हैं.
साख निर्माण की प्रक्रिया इस प्रकार है:
मान लीजिये कोई व्यक्ति 1000 रुपये बैंक में जमा करके एक बचत खाता खोलता है. इस जमा को प्राथमिक जमा (primary deposit) कहा जाता है. बैंक 1000 रुपये की पासबुक में एंट्री करके पासबुक खाताधारक को दे देता है. अब बैंक अपने अनुभव के आधार पर यह मान लेता है कि यह खाता धारक एक बार में 10% से अधिक राशि को नही निकलेगा अर्थात इस मांग को पूरा करने के लिए बैंक अपने पास जमा की गयी राशि का केवल 10% अर्थात 100 रुपये रखेगा और बकाया का 900 रुपये किसी उद्यमी को उधार देने के लिए अलग रख लेता है.
अब मान लो व्यक्ति A को किसी व्यवसाय को शुरू करने के लिए 900 रुपये की जरुरत है तो वह बैंक जाता है और 900 रुपये का ऋण ले लेता है. बैंक A के नाम का भी एक खाता खोल देता है और पासबुक जारी करके उसमे 900 रुपये की एंट्री कर देता है अर्थात व्यक्ति A अपनी इच्छा के अनुसार कभी भी इस रुपये को निकाल सकता है. यहाँ पर भी बैंक अपने अनुभव के आधार पर यही सोचता है कि व्यक्ति A एक बार में 10% से अधिक धन की निकासी नही करेगा अर्थात बैंक को व्यक्ति A के चेक का भुगतान करने के लिए सिर्फ 90 रुपये (इसे कैश रिज़र्व कहा जाता है) रखने की जरुरत है बकाया का 810 रुपये बैंक के पास फिर से किसी और को उधार देने के लिए बच गया है.
अब तीसरे केस में फिर यह मान लिया जाता है कि व्यक्ति B को कुछ लोन की जरुरत है और वह उसी बैंक में जाता है जहाँ पर B गया था, संयोग से B व्यक्ति की लोन की जरुरत 810 रुपये की है तो बैंक उसका भी खाता खोलकर पासबुक जारी करेगा और उम्मीद करेगा कि वह भी केवल लोन की मंजूर राशि 810 का केवल 10% ही इस्तेमाल करेगा अर्थात चेक या किसी अन्य साधन से बैंक से निकलेगा. इस केस में भी बैंक को अपने इस ग्राहक की जरुरत को पूरा करने के लिए केवल 81 रुपये की नकद राशि अपने पास रखने की जरुरत है और बकाया की राशि अर्थात 729 रुपये की राशि फिर से किसी और ग्राहक को देने के लिए बैंक के पास बच गयी है.

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अब मान लो कि C भी इसी बैंक से उधार लेने जाता है और उसे 729 रुपये की राशि उधार मिल जाती है. इस मामले में भी बैंक ऊपर वाली प्रक्रिया अपनाएगा.
इस प्रकार बैंक अपने अनुभव के आधार पर लोन के लिए स्वीकृत राशि का केवल 10% नकद के रूप में अपने पास रखता रहेगा और बकाया की राशि को अपने अन्य ग्राहकों को लोन देता रहेगा और यह प्रक्रिया तब तक चलती रहेगी जब तक कि बैंक के पास उधार देने योग्य राशि शून्य ना हो जाये.
आइये अब देखते हैं कि एक बैंक ने सिर्फ 1000 हजार रुपये की नकद जमा के आधार पर कितना ऋण लोगों को दिया:
इस ऋण सृजन की प्रक्रिया में आपने देखा कि बैंक ने 1000 रुपये की जमा राशि की मदद से केवल तीन ग्राहकों से कुल 2439 रुपये का ऋण सृजन किया है और उसने अपने पास नकदी के रूप में केवल 271 रुपये रखे हैं. यदि आप ऋण देने की प्रक्रिया को अंत तक ले जायेंगे तो आप पाएंगे कि बैंक ने 1000 रुपये के नकद जमा से 9000 रुपये के बराबर का कर्ज लोगों को बांटा है.

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आइये अब इस पूरी प्रक्रिया के सम्बन्ध में उठने वाले सवालों के जबाब जानते हैं.
प्रश्न 1: इस प्रक्रिया से बैंक को लाभ कैसे हुआ?
उत्तर: बैंक ने जिन ग्राहकों को लोन दिया है उस पर एक ब्याज भी लगाया है, प्रोसेसिंग फीस भी वसूली है और यदि कर्ज लेने वाला व्यक्ति EMI समय पर ना चुका पाए तो पेनल्टी भी लगता है.
प्रश्न 2. बैंक किस सीमा तक कर्ज दे सकता है?
उत्तर : जब तक बैंक के पास अतिरिक्त राशि बची हुई है वह कर्ज देता रहेगा. एक अनुमान के अनुसार बैंक के पास जितनी नकदी राशि आती है उसका 10 गुना तक कर्ज बैंक दे सकता है.
प्रश्न 3. यदि कोई व्यक्ति बैंक के अनुमान से ज्यादा पैसा निकलता है तब तो बैंक का पूरा सिस्टम ही बदल जायेगा.
उत्तर: नही इससे कोई फर्क नही पड़ता है क्योंकि यदि कोई व्यक्ति बैंक के अनुमान से ज्यादा रुपया निकलता है तो कई लोग अनुमान से कम भी तो निकालते हैं. इस प्रकार बैंक के अनुमान में थोडा बहुत उतार चढ़ाव होता रहता है और बैंक के पास इतनी ज्यादा राशि होती है कि कुछ अनुमान गलत निकलने से कुछ फर्क नही पड़ता है. लेकिन कई मामलों में जब किसी को कोई बड़ी राशि निकालनी पड़ती है तो उसे पहले से बैंक को सूचना देनी पड़ती है ताकि बैंक उस राशि का इंतजाम कर सके.
इस प्रकार आपने देखा कि बैंक किस चतुराई के साथ ग्राहकों के जमा धन से ही लाभ कमाते हैं और अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी सखा का सृजन करते है. दरअसल बैंक धन जमा करने वालों और उधार मांगने वालों के बीच पुल का काम करता है. जिन लोगों को अपना धन सुरक्षित रखना है और एक निश्चित आय अर्जित करनी होती है वे लोग बैंक में रुपये जमा करते हैं दूसरी ओर कुछ लोग जोखिम उठाना पसंद करते हैं वे लोग बैंकों से रुपये उधार लेते हैं.

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